सोमवार, मार्च 12, 2012

तो क्या डूब जाने का हुनर भी बेअंजाम रक्खूं मैं

ईमान अपना , खुद सलामत, बाहिसाब रक्खूं मैं
किसी और के पैमाने पे आखिर, क्या-क्या नाप रक्खूं मैं

हां! तैरना नही आता मुझको, 
तो क्या डूब जाने का हुनर भी बेअंजाम रक्खूं मैं

ये इक फूल है और वो एक बच्चा हंसता हुआ
और ये जो हैं बस वो हैं
"अ‍ल्लाह" तेरे सिवा, इनका और क्या नाम रक्खूं मैं

पैसे,किताब,पुरानी यादें , सब उधार चुका दो मेरा
वक्त हुआ लौटने का, समेट कर एकबार फिर सब सामान रक्खूं मैं

सोचता रहा ज्यादा, जीया कम
जिस्म मे अपने उस शख्स को , और कब तक सम्हाल रक्खूं मैं

शुक्रवार, फ़रवरी 05, 2010

मैं अब भी कह सकता हूं


मैं अब भी कह सकता हूं
कि बारिश का घर आसमां में है कहीं
और उसे ढूंढना है मुझे – तुम्हारे लिये

मैं अब भी देख सकता हूं
इन्द्रधनुष किसी की आंखों में

तितलियों को गाते , हवा को संगीत बजाते
सुन सकता हूं
और
दिन में तारे गिन सकता हूं
मैं अब भी

तुम्हारे और मेरे बीच
कोई अनकहा रिश्ता
पनपा था कभी
हां, मैं कह सकता हूं अब भी
पूरे यकीन से|

शुक्रवार, अक्टूबर 06, 2006

वह नहीं जानता दर्द !

“वह नहीं जानता दर्द!
लाख में एक को होती है बीमारी
” 
मैं पढता हूँ – अखबार मे
पर
युद्ध, हिंसा और बर्बरता की इस दुनिया मे
कहीं गलत तो नहीं
यह डॉक्टरी आँकडा ?
और फिर वह नहीं जानेगा दर्द
तो क्या वह जान पायेगा मानवता ?
खैर!
दर्द को जानना और समझना
अपने आप मे दर्द पैदा करना है
और दर्द को न जानना भी
एक दर्द है
दुआ है कि
वह जान पाए दर्द
पर कुछ
शायराना अंदाज मे
यूं कहूं तो बेहतर होगा
खुशकिस्मत है वह
कि इस बेदर्द दुनिया मे
नहीं जानता दर्द !

सोमवार, सितंबर 25, 2006

कभी पूरा न हो पाने के लिए...

कभी पूरा न हो पाने के लिए
तुम्हें लिखे
किसी अधूरे खत की तरह
गुजरेंगे अब दिन
और मैं भी
तुम बिन ।

मंगलवार, सितंबर 05, 2006

प्यार

तुम्हें होगा
तो जानोगे
कि बिना हुए
जाना नहीं जाता।

शनिवार, सितंबर 02, 2006

ओ पंछियों

ओ पंछियों
क्यों आते हो तुम
और बनाते हो बसेरा
मेरे घर के बगल में खडे
इस ऊंचे से पेड पर
जबकि
तुम यह जानते हो कि
एक दिन तो सूख ही जाना है इसे
फिर किस पर
आ उडोगे तुम
फिर क्यों इस पर बसते और उजडते हो तुम
क्या इसका सूख जाना टालने के लिए ?

ओ पंछियों
ओ रंग बिरंगे पंछियों
सर्दियों की धूप में क्यों आते हो तुम
जबकि तुम यह जानते हो कि
मैं अपनी हर कमजोरी को पालता रहूंगा
दुनिया के दर्द को सालता रहूंगा
और यूं मेरा इस क्रम से कभी पीछा न छूटेगा
फिर क्यों आते हो तुम
क्या इस भ्रम को मुझसे निकाल पाने के लिए ?

ओ पंछियों
ओ मधुर कंठ गवईयों
क्यों आते हो तुम
मेरे घर के बगल में खडे इस ऊंचे से पेड पर
और फिर
क्यों छोड कर चले जाते हो तुम इसे
अपनी यादें इन गिलहरियों के कोटरों में भरकर
मैं
सीख लेना चाहता हूं
इन गिलहरियों से
इनके जीने का तरीका
जो तुम्हारे न होने के बावजूद
कभी, कहीं नहीं जाती इस पेड को छोडकर

ओ पंछियों
ओ मानवों की दुनिया से दूर
किसी और दुनिया के वाशिंदों
आओ बैठो
मेरी इस कामनासिक्त देह पर
और बनाओ अपना घर
आओ
इस पर बसो और इसे उजाड जाओ
इसे बसाने के लिए
ये अभी बाकी है
तुम्हारे मधुर गीत गुंजाने के लिए
आओ
कि ये अभी बाकी है
तुम्हारे यहां आकर चले जाने
और फिर वापस लौट कर आने के इंतज़ार में
रिक्त हो जाने के लिए ।

शुक्रवार, सितंबर 01, 2006

कविता, किताब और कम्प्यूटर

कविता, किताब और कम्प्यूटर
इन तीनों के बीच
खुश रह्ता हूँ मै

मै कह डालता हूँ
उन चीजों को
जिनको मह्सूस करता हूँ मै

जाना जा चुका है जो
कुछ और जानने-पहचानने के लिए
उस सबको भी
जान लेना चाहता हूँ मै

हम जो तमाम करते है
हम जो दिमाग रखते है
हम जो दिमाग मे पालते है दिल को
हम जो महसूस करते है
हम जो जानते है
और हम जो रखते है जानने की इच्छा

आखिर हम जैसे हैं वैसे क्यों हैं
और क्या हो जाना चाहते हैं
बस यही सब कुछ एक मशीन को
सिखा देना
चाहता हूँ मै

यों इन तीनों के बीच
खुश रहता हूँ मै
कविता, किताब और कम्प्यूटर!

मंगलवार, जुलाई 01, 2003

तुम

शोर मे
शान्ति सी तुम
भोर में
आरती सी तुम

पंछी मे
पंखों सी तुम
बंसी में  
छिद्रों सी तुम

हकीकत में 
भ्रान्ति सी तुम
स्वप्न में 
जीती जागती सी तुम

कला में 
सृजन सी तुम
प्रेम में 
समर्पण सी तुम

धडकनों के लिए
हृदय सा केतन हो तुम
जानते हुए
बनता जो अनजान
वो
अवचेतन हो तुम !